वैदिककालीन आर्यों का धर्म और दर्शन

वैदिक साहित्य की रचना अनेक शताब्दियों में हुई थी,इस कारण वैदिक धर्म की एकरूपता के स्थान पर समय के साथ परिवर्त्तन दृष्टिगोचर होता है।स्वयं ऋग्वेद में ही कहीं पर एकेश्वरवाद की चर्चा की गयी है,कहीं बहुदेववाद की और कहीं सर्वेश्वरवाद की।वैदिक लोगों के धार्मिक विचार ऋग्वेद के श्लोकों में स्पष्ट दिखाई देते है।वे चतुर्दिक प्राकृतिक […]

600ई.पूर्व में धार्मिक आंदोलन के समय उत्तर भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

छठी शताब्दी ई.पूर्व का काल नये धर्मों के विकास से संबद्ध है।इस काल में ब्राह्मणों के आनुष्ठानिक रूढ़िवादी विचारों का विरोध लगातार बढ़ रहा था।इस कारण से बहुत सारे अनीश्वरवादी धार्मिक आंदोलनों का उद्भव हुआ,इनमें से बौद्धमत और जैनमत संगठित तथा लोकप्रिय धर्मों के रूप में विकसित हुए।दोनों धर्मों के प्रवर्तकों ने शारीरिक और मानसिक […]

धार्मिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि

सामाजिक और आर्थिक जीवन के बदलते हुए रूप,जैसे नगरों का विकास,शिल्पी समुदाय का विस्तार,वाणिज्य एवं व्यापार का तीब्र प्रगति धर्म और दार्शनिक चिंतन में होनेवाले परिवर्तनों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध थे।स्थापित रूढ़िवादिता और नागरिक केंद्रों में उभरते नये गुटों की आकांक्षाओं में होनेवाले संघर्ष ने इस प्रतिक्रिया को और तेज किया होगा,जिससे चिंतन के […]

भारतीय इतिहास का सूत्रकाल

प्राचीन भारत के इतिहास में सूत्रकाल का समय 600ई.पूर्व से 300ई.पूर्व तक माना जाता है।इसकाल में वैदिक संहिताओं को सरल बनाने के लिए वेदांगों की रचना की गयी जनकी रचना छः है।इनके नाम है- 1.शिक्षा : शिक्षा को उच्चारण विधि भी कहा जाता है।वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण एवं शुद्ध स्वर क्रिया की विधियों के […]

भारतीय दर्शन का मूलाधार : षड्दर्शन

षड्दर्शन में जीवन चक्र से मुक्ति के लिए छः व्यवस्थाएं की गयी है।इन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया गया है।1.न्याय और वैशेषिक 2.सांख्य और योग 3.मीमांसा और वेदांत। 1.न्याय :न्याय दर्शन का प्रतिपादन अक्षपाद गौतम ने किया था।न्याय का तात्पर्य हेतुविद्या या तर्कशास्त्र है।वात्सायायन के अनुसार तार्किक प्रमाणों के नियमों द्वारा ज्ञान की वस्तुओं की […]

असनातनी मतावलम्बी और दर्शन

600ई.पूर्व में पुरोहितवाद और ब्राहणों द्वारा स्थापित चतुःवर्णीय व्यवस्था के खिलाफ घोर प्रतिक्रिया हुई और उतरी भारत में कई असनातनी सम्प्रदाय उठ खड़े हुए।ये लोग जितना वैदिक क्रियाओं के विरोधी थे उतना ही बौद्ध धर्म के भी खिलाफ थे।भगवान बुद्ध के छः प्रमुख विरोधी बताये जाते है -1.मक्खलिपुत्त गोशाल 2.पुरण काश्यप 3.अजित केशकम्बलिन 4.पाकुध कच्चायन […]

वैष्णव या भागवत सम्प्रदाय

आजकल भागवत या वैष्णव धर्म का जो रूप प्रचलित है,वह दूसरी सदी ई.पूर्व के बाद का है।भागवत धर्म की दो शाखाएँ थी-भागवत एवं शैव।कालांतर में गणपत्य सम्प्रदाय,सूर्य सम्प्रदाय और शाक्त सम्प्रदाय भी इससे जुड़ गए।ऋग्वेद में कृष्ण का उल्लेख एक ऋषि के रूप में मिलता है।छान्दोग्य उपनिषद में कृष्ण का वर्णन देवकी के पुत्र एवं […]

जैन धर्म और महावीर

जैनों के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी को जैनधर्म का संस्थापक माना जाता है।महावीर का जन्म 540 ई.पूर्व वैशाली जिले कुण्डग्राम में हुआ था।पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक कुल के क्षत्रिय थे,उनकी माता त्रिशला लिच्छवी राजकुमारी थी।पत्नी का नाम यशोदा था और भाई का नाम नन्दीवर्मन था।वर्धमान महावीर पहले ऋषभदत्त ब्राह्मण की पत्नी देवनंदा के गर्भ में आये […]

गौतम बुद्ध और बौद्ध दर्शन

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पूर्व में नेपाल की तराई के लुम्बिनी वन (आधुनिक रुमिन्देइ)में हुआ था।पिता शुद्धोधन,शाक्य गण के प्रधान और माता मायादेवी कोलिय गणराज्य की कन्या थी।गौतम को देखकर कालदेव तथा कौण्डिन्य ने भविष्यवाणी की थी कि बालक या तो चक्रवर्ती राजा होगा या सन्यासी। यशोधरा उनकी पत्नी थी जो बिम्बा,गोपा,भद्रकच्छाना आदि नामों […]

उत्तरवैदिककालीन भारत

उत्तरवैदिककालीन इतिहास की जानकारी ऋग्वेद को छोड़कर अन्य तीन वेदों यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद से मिलती है।इसके अतिरिक्त ब्राह्मण,आरण्यक तथा उपनिषद इस काल की जानकारी के लिए महत्वपूर्ण स्रोत साबित हुए है।ये सभी उत्तरकालीन वैदिक ग्रंथ लगभग 1000ई.पूर्व से 500ई.पूर्व के बीच उत्तरी गंगा के मैदान में रचे गए थे।इस क्षेत्र से लगभग 700 उत्तरवैदिक […]