औपनिवेशिक भारत में महिलायें

महिलाओं के दमन एवं उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष अपनी निरंतरता में प्रत्येक युग में विद्यमान रहा है। परम्परागत दृष्टि से स्त्री के प्रति व्यवस्था का रवैया निश्चित मानदडों एवं आदर्शां के नियत व्यवहारों से संचालित होता रहा है, जिसमें स्त्री को तय कर दी गई भूमिका में निर्धारित आचार-संहिता के अनुसार जीना है, जिनके निर्धारण […]

मध्यकालीन भारतीय समाज में महिलायें

मुस्लिम समाज में भी हिन्दूओं की तरह महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की थी। उनके अधिकारों एवं स्तर में काफी गिरावट आई तथा उन्हें पुरुषों पर आश्रित स्वीकार किया जाने लगा। मुस्लिम समाज में विभिन्न वर्गों की स्त्रियों की दशा अन्य वर्गां की स्त्रियों से अच्छी थी। मुस्लिम शासकों ने राजमहल में हरम की व्यवस्था […]

सती प्रथा

मृत पति की चिता पर जीवित पत्नी के जलाये जाने की प्रथा अथर्ववेद के पूर्व किसी समय आर्यों में प्रचलित थी और उस प्राचीन परम्परा का अवशेष रूप सतीप्रथा थी, क्योंकि हड़प्पा संस्कृति में लोथल के उत्खनन से तीन शवयुग्म मिले हैं जिसमें स्त्री-पुरुष को साथ-साथ दफनाया गया है तथा कालीबंगन से एक ऐसा ही […]

मंदिरों में देवदासी

वैदिककाल में आर्यो में यह मान्यता थी कि विवाह के समय प्रत्येक हिन्दू वधू इन्द्र समेत पाँच देवताओं से पहले विवाह करती थी। कुन्ती ने भी पॉँच देवताओं को अपने को समर्पित किया, दमयन्ती ने भी वैसा ही किया था। पुराणों में भी यह उल्लेख मिलता है कि मानव स्त्री से देवताओं का शारीरिक सम्बन्ध […]

परदा प्रथा का विकास

परदा प्रथा, देवदासी प्रथा, वेश्यावृत्ति एवं सतीप्रथा वे महत्वपूर्ण कारण रहे जिन्होंने मध्ययुगीन सामाजिक परिस्थितियों में महिलाओं को निम्नत्तर स्थिति में पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो बीज रूप में प्राचीन काल से ही मौजूद रहे थे। वैदिक काल मे पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था। स्त्रियाँ स्वतंत्रातापूर्वक सार्वजनिक स्थानों में विचरण करती थी तथा […]

प्राचीन भारत में महिला शिक्षा

वेदों में उल्लिखित कुछ मंत्र इस बात को रेखांकित करते है कि कुमारियों के लिए शिक्षा अपरिहार्य एवं महत्वपूर्ण मानी जाती थी। स्त्रियों को लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों प्रकार की शिक्षाएँ दी जाती थी। सहशिक्षा को बूरा नहीं समझा जाता था। गोभिल गृहसूत्र में कहा गया है कि अशिक्षित पत्नी यज्ञ करने में समर्थ नहीं […]

विवाह प्रथा एवं महिलाओं के कर्त्तव्य

वैदिक युग में यौन परिपक्वता के पश्चात् ही विवाह का प्रचलन था। ऋग्वेद में विवाह की उम्र के बारे में स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। अवेस्ता से पता चलता है कि ईरान में कन्याओं का विवाह 15-16 वर्ष की आयु विवाह के लिए ‘उद्वाह‘ शब्द का प्रयोग, कन्या का विवाह यौवनावस्था में होना सिद्ध करता है। […]

प्राचीन भारतीय समाज में विधवाएँ और विधवा विवाह

आरम्भिक वैदिक काल में चूॅँकि आर्य अपनी प्रजनन क्षमता को व्यर्थ नहीं कर सकते थे, साम्राज्य विस्तार हेतु परिवार में वृद्धि आवश्यक थी। इसलिए विद्वानों ने वैदिक काल में विधवा विवाह पर सहमति व्यक्त की है। ऋग्वेद के दसवें मंडल के अध्याय 40 का दूसरा एवं 18वें अध्याय का आठवाँॅ श्लोक विधवा विवाह से सम्बन्धित […]

प्राचीन काल में महिलाओं के साम्पत्तिक अधिकार

सामाजिक स्तरीकरण में उच्च जातियों की तुलना में शूद्र महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। ब्राह्मणिक ढाँचे पर आधारित वर्णव्यवस्था के कारण भी स्त्रियों की स्थिति में अन्तर था। बौधायन धर्मसूत्र से ज्ञात होता है कि उसके आर्थिक कारण थे। बौधायन के अनुसार कृषि आदि सेवा कर्म में सन्नद्व होने के कारण वैश्य एवं […]

प्राचीन भारत में महिलाएँ

किसी भी समाज में व्यक्ति की पदस्थिति और भूमिका सम-सामायिक सामजिक मूल्यों तथा आदर्शों पर आधारित होती है। कोई भी स्थिति चिरंतन व स्थाई नहीं रह सकती समय के साथ-साथ सामाजिक परिस्थितियॉँ परिवर्तित होती जाती है। साथ ही साथ परम्परागत आदर्शों और मूल्यों में परिवŸार्न होते रहते है। 19वीं शताब्दी के इतिहासकार बैकोफेन और मार्गन […]